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मध्यप्रदेश में विधान परिषद के गठन पर मंथन, विपक्ष ने किया इसका विरोध

मध्यप्रदेश में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार विधानसभा चुनाव में जनता से किए हुए वादों को पूरा करने में लगी है। कमलनाथ सरकार अब अपने वादे के अनुसार मध्यप्रदेश में विधान परिषद गठन के लिए प्रक्रिया प्रारंभ कर रही है। मंगलवार को विधान परिषद के गठन को लेकर मुख्य सचिव एस.आर.मोहंती ने अधिकारीयों के साथ बैठक की। इस बैठक में विधि और संसदीय कार्य विभाग विधान परिषद के गठन को लेकर प्रक्रिया का अध्यय कर कानूनी पक्ष देखेगें। जिसके बाद संबंधित विभाग अपना अभिमत सरकार को देगें। जिसके बाद प्रक्रिया शुरू की जाएगी। बैठक में चर्चा के दौरान विधान परिषद के गठन की कार्यवाही में कितना वक्त लगेगा, दूसरे राज्यों में क्या व्यवस्था है आदि के संबंध में जानकारी जुटाने पर विचार हुआ। साथ ही परिषद गठन के लिए मप्र में वर्ष 1956 और 2019 की व्यवस्था पर अध्ययन तथा मध्यप्रदेश से अगल हुए राज्य छत्तीसगढ़ के बाद वर्तमान में क्या प्रावधान लागू होंगे इस पर भी विचार किया गया।

कमलनथ सरकार की कोशिश है कि विधानसभा के शीतकालीन सत्र में इसका संकल्प पेश हो जाए। इसके बाद गठन प्रस्ताव को केंद्र सरकार के पास मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। दरअसल, इसके गठन में सबसे बड़ा पेच खर्च को लेकर है। संसदीय मामलों से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि सीधे तौर पर खर्च 30 से 40 करोड़ रुपए तक होगा। अन्य खर्च अलग हैं। इसलिए संकल्प पेश होने से पहले सभी पक्षों का अध्ययन किया जा रहा है।

 

विधान परिषद को लेकर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक में वित्त, संसदीय कार्य, नगरीय विकास एवं आवास, उच्च शिक्षा, स्कूल शिक्षा, विधि विभाग, विधानसभा, चुनाव आयोग आदि के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। इधर, परिषद के गठन को लेकर सियासत भी शुरू हो गई है। भाजपा ने इसका विरोध किया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह ने कहा है कि विधान परिषद के गठन की घोषणा जनता का ध्यान भटकाने की कवायद है। सरकार ने कर्ज माफी, बिजली बिल जैसे जनता से जुड़े मुद्दों पर अपने वादे पूरे नहीं किए, ये विधान परिषद से ज्यादा जरूरी हैं। इसके गठन पर खर्च होने वाले 100 करोड़ रुपए की पूर्ति सरकार कैसे करेगी।

 

जबकि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि विधानस परिषद का औचित्य क्या है। इससे जनता पर अनावश्यक बोझ पड़ेगा। क्या इसके बिना विकास रुक रहा है? सिर्फ कुछ लोगों को एडजस्ट करने और मंत्री बनाने के लिए यह काम उचित नहीं है। मेरे सामने भी इसका प्रस्ताव आया था, मैंने मना कर दिया था। मैं इस बारे में मुख्यमंत्री को पत्र लिखूंगा। उनसे चर्चा भी करूंगा।

 

तो वही कांग्रेस के राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील विवेक तंखा ने इसका स्वागत किया है। उनका मानना है कि विधान परिषद के गठन से मंत्रीमंडल पर कोई असर नहीं पड़ेगा। विधानसभा के कुल सदस्यों में से मुख्यमंत्री सहित 15 प्रतिशत से ज्यादा को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया जा सकता, लेकिन उनकी संख्या 12 से कम नहीं होना चाहिए। विधान परिषद के गठन से इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। मंत्रियों की संख्या वही रहेगी। विवेक तंखा ने कहा कि प्रदेश की कांग्रेस सरकार अपने वचन पत्र में किए गए वादों को पूरा कर रही है यह स्वागत योग्य कदम है।

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