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अग्रिम जमानत के लिए समय सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में कहा कि गिरफ्तारी की आशंका के आधार पर अभियुक्त को दी गई अग्रिम जमानत को समय सीमा में नहीं बांधा जा सकता।

न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि इस तरह की गिरफ्तारी – पूर्व जमानत सुनवाई पूरी होने तक जारी रह सकती है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अदालत द्वारा समन किए जाने के बाद भी अग्रिम जमानत समाप्त नहीं होगी, हालांकि इस बारे में फैसला लेने को लेकर अदालत स्वतंत्र होगी।
संविधान पीठ ने कहा, हालांकि इस तरह की राहत पुलिस को जांच करने से नहीं रोकेगी। संविधान पीठ ने कहा कि अग्रिम जमानत मंजूर करते वक़्त अदालत को जिन बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए उनमें संबंधित व्यक्ति की भूमिका, साक्ष्य से छेड़छाड़ करने और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका शामिल है।

इस तरह की जमानत की शर्तें हरेक मामले में अलग हो सकती है। संविधान पीठ में न्यायमूर्ति इंदु बनर्जी, न्यायमूर्ति विनीत सरन, न्यायमूर्ति एम आर शाह और न्यायमूर्ति एस रवीन्द्र भट शामिल हैं। संविधान पीठ ने सुशीला अग्रवाल एवं अन्य बनाम दिल्ली सरकार के मामले में गत वर्ष 24 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था।

गौरतलब है कि 15 मई 2018 को न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ, न्यायमूर्ति एम एम शांतनगौदर और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा की पीठ ने इस मामले को संविधान पीठ को भेज दिया था।

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